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कृषि सुधार कानूनों का विरोध जताते हुए किसानों ने लगाए अनोखे नारे ‘पराली दा की बणूं, धुआं बणू’

लुधियाना। उत्तर भारत में हर साल अक्टूबर-नवंबर में किसानों की तरफ से जलाई जाने वाली पराली लोगों का दम घोंटती है। सांस लेने में परेशानी होने पर अस्पतालों में एकाएक मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। एयर क्वालिटी इंडेक्स भी अपने चरम पर पहुंच जाता है। दिल्ली की सरकार धुएं के लिए पंजाब को दोषी ठहराती है। हालांकि सरकार और ट्रिब्यूनल ने काफी सख्ती की है। पराली जलाने पर सख्त सजा के प्रावधान भी किए हैं। बावजूद इसके सालों से पराली जलाना बदस्तूर जारी है। पिछले साल के मुकाबले इस सीजन में पराली जलाने की घटनाएं ज्यादा हुईं। माना जा रहा है कि केंद्र के कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसान तलखी में पराली जला रहे हैं। इस बात का अंदेशा इसी से हुआ कि एक धरने के दौरान किसान नारे लगा रहे थे, पराली दा की बणूं, फिर बोले धुआं बणूं।

हिल रही उद्योगों की नींव
कृषि सुधार कानून के विरोध में करीब सवा महीने से किसानों का आंदोलन चल रहा है। ट्रेनों के पहिए थमे हुए हैं। नतीजतन औद्योगिक इकाइयों में न माल आ रहा है और न ही तैयार माल बायर्स तक पहुंच रहा है। ऐसे में अब उद्योग जगत की नींव हिल रही है, उद्यमियों की सांसें फूल रही हैं। बावजूद इसके सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। किसान आंदोलन खत्म कराने को लेकर सरकार कोई गंभीरता नहीं दिखा रही। अब उद्यमियों को भी समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें। इन परिस्थितियों से उद्यमी राजन कुमार झुंझला गए हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब की भौगोलिक स्थिति ने तो मार ही दिया है। देश का सीमावर्ती राज्य होने के कारण रेलवे को खास फर्क नहीं पड़ रहा। ट्रेनें अंबाला से चल रही हैं जबकि सूबे का उद्योग व्यापार चौपट हो गया है, लेकिन कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है।

लाकडाउन की भरपाई कर रहे

कोरोना के कारण लगे लाकडाउन में सब कुछ बंद रहा। मरीज घटने गले तो लोगों में भी डर कम हो गया। अब जबकि त्योहारी सीजन है तो लोग बाजारों में उमडऩे लगे हैं। वे अपनी जेब के अनुसार खरीदारी कर रहे हैं। दुकानदार भी अधिक मुनाफा कमाने की जुगत में लगे हैं। इनमें मेहंदी लगाने वाले भी पीछे नहीं रहे। करवाचौथ पर बाजारों में मेहंदी लगाने वालों की दुकानें खूब सजीं। डिजाइनर मेहंदी लगवाने वाली महिलाओं ने भी इस पर्व का पूरी तरह आनंद लिया। घुमार मंडी मार्केट में एक महिला शशि ने मेहंदी वाले से रेट पूछा तो वह चौंक गई। अब रेट ही उसने ऐसा बताया था। तभी महिला ने कहा कि भाई तुम तो पिछले साल के मुकाबले रेट दोगुना से भी अधिक ले रहे हो। दुकानदार ने भी तपाक से जवाब दिया कि सात माह तक बेकार बैठे हैं, अब भरपाई तो करनी ही है।

ट्रेनें ठप और छुट्टी भी नामंजूर
किसानों के आंदोलन के कारण रेल सेवाएं बंद हैं। रेलवे स्टेशनों पर रौनक गायब है, केवल मुलाजिम ड्यूटी करते दिख रहे हैं। इससे उद्योग जगत को तो भारी नुकसान हो ही रहा है, वहीं यात्री भी परेशान हैं। उनको अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए पहले 110 किलोमीटर दूर अंबाला तक सड़क के रास्ते जाना पड़ रहा है, फिर वहां से ट्रेन पकड़ रहे हैं। व्यापारी और यात्री दुआ कर रहे हैं कि किसान आंदोलन खत्म हो और ट्रेन फिर से दौड़े। इतना ही नहीं इन परिस्थितियों में रेल मुलाजिम भी खासे दिक्कत में हैं। रेलवे स्टेशन के प्रभारी अशोक सिंह के पास एक मुलाजिम अपने घर जाने के लिए छुट्टी का आवेदन लेकर पहुंचा। अफसर ने साफ ही कह दिया कि अभी विकट परिस्थितियां हैं। कभी भी कुछ भी हो सकता है। इस पर मुलाजिम बोला, साहब न रेल चल रही, न छुट्टी मिल रही है। फिर कैसे चलेगा।

Kranti Headline
Author: Kranti Headline

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